बाबा जी महाराज से मिलाप (Baba Ji Maharaj Se Milaap)

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गुरु प्यारी साध संगत जी राधा स्वामी जी। आज की साखी बाबा जी
महाराज से मिलाप (Baba Ji Maharaj Se Millap)

यह साखी एक सत्संगी भाई की है, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे बाबा जी महाराज जी से उनका मिलाप हुआ, तो शुरू करते हैं आज की साखी ।

सत्संगी भाई कहते है कि मेरे पिता जी सूबेदार मेजर थे। उन्हें संत महात्माओं और साधुओं से मिलने का बहुत शौक था। जब मैं छोटा था तब वे जिस भी साधु महात्मा के पास जाते, मुझे साथ ले जाते। मैं जितना समय उनके साथ रहा, साधु, संतों और महात्माओं से मिलता रहा।

इस तरह थोड़े ही समय मे साधु, संतों, महात्माओं से मिलने की रुचि बढ़ गई जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया मेरा यह शौक और बढ़ता गया, इसमें कोई शक नहीं कि यह रूहानियत अमली ज्ञान है, क्योंकि एक वक़्त था जब मैं खुद कहता था कि गुरु की क्या जरूरत है? क्योंकि मैं खुद शुरू के दिनों मे किसी सभा का प्रेसीडेंट रहा, किसी का सेक्रेटरी रहा, किसी का कुछ तो किसी का कुछ, लेकिन जब समझ आई तो गुरु को ढूँढना पड़ा।

उम्र के साथ समझ भी बढ़ती गई

जब मैं गुरु ग्रन्थ साहिब पढता, तो उसमे बार-बार आता जाओ किसी गुरु के पास। उसके बाद मैं गुरु की खोज मे हर एक जगह गया। किसी भी जाति की सोसाइटी में किसी महात्मा का पता लगा तो मैं वहां भी गया। बाग में फूल भी होते है और कांटे भी। कई महात्मा मिले, बातचीत भी हुई लेकिन कोई मुझे वो ना दे सका जो मुझे चाहिए था। लेकिन फिर भी मैं वहां से कोई एसा विचार मन में लेकर नहीं आया जिससे मेरे रूहानी सफर पर कोई फर्क पड़े।

दूसरी जगह तबादला होने के बाद

आखिर मेरा तबादला दूसरी जगह हुआ। वहां मैंने एक फ़क़ीर को देखा। उसने लंगोटी पहनी हुई थी और मस्त बैठा था। मैंने कई महीने उसकी लगातार संगति की, वह कई बार आकर मेरे पास महीना-महीना रहा, लेकिन उसने दिया कुछ नहीं। और फिर कर एक रात को मैंने उसको घेर लिया और कहा आज तो मुझे सच सच बता दो? उसने कहा सच पूछते हो तो बात यह है कि अभी तुम्हारा समय नहीं आया है। तो मैंने पूछा क्या इस जन्म में समय आएगा? तब उनसे बोल हाँ! आयेगा! फिर मैंने कहा बताओ, वह कौन से महात्मा हैं ? उसने कहा वह अपने आप ही तुम्हारे पास आ जाएंगे ।

तीसरी जगह तबादला होने के बाद

उसके बाद मेरा तबादला फिर पहाड़ी इलाके में हुआ। तब बाबा जी महाराज भी वहां आये हुए थे। बाबा जी के साथ उनकी पत्नी भी थी। मैं इग्ज़ेक्यटिव इंजीनियर के बंगले से लौट रहा था। रास्ते में बाबा जी महाराज ने मुझे देखा ओर अपनी पत्नी से कहने लगे “हम इस सिक्ख के लिए यहाँ आए है”। तब बाबा जी महाराज की पत्नी ने कहा कि इसने तो आपसे अभिवादन भी नहीं किया। इस पर बाबा जी ने कहा अभी इस बेचारे को क्या पता। परसों यह मेरे पास आयेगा। अभी यह मुझे जानता तक नहीं।

बाबा जी से मुलाकात

उन दिनों बाबा जी महाराज बाबू सुख दयाल के चौबारे में ठहरे हुए थे और गुरु ग्रंथ साहिब से सत्संग करते थे। दो दिन बाद मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा कि आप संतों-महात्माओं से मिलने के शौकीन हो। आओ ! आज आपको एक महात्मा के दर्शन कराऊँ। वह मुझे उस दिन बाबा जी महाराज के पास ले गया। मैं कई दिन उनकी संगति मे रहा। मैं सवा करता गया, वह जवाब देते गए। जो भी मेरे बीस साल के शक थे, सारे चार दिन में खत्म हो गये। मैंने कहा, बाबा जी अब मुझे नाम बक्शीश कर दो ! लेकिन राधा स्वामी नाम को मैं सुनना नहीं चाहता, यह नया सा लफ्ज मेरे दिल में न डालो।

जाप साहिब का पाठ लिया

इस पर बाबा जी महाराज ने पूछा, “तो क्या कोई वाणी तुम्हारे नित्य-नियम में है? मैंने कहा, जी जपजी साहिब और जाप साहिब सदा मेरे नित्य-नियम में है। कहने लगे कि जाप साहिब में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने मालिक के कितने नये नाम रखे हैं? मैंने कहा, जी गिने तो नहीं लेकिन ख्याल है, कोई बारह-चौदह सौ होंगे। तब बाबा जी महाराज कहने लगे, अगर एक महात्मा ने परमात्मा का नाम ‘राधास्वामी’ रख दिया तो क्या जुल्म हो गया? वहां स्वामी जी महाराज की किताब ‘राधास्वामी सार बचन, छन्द-बन्द‘ वहाँ पड़ी हुई थी। बाबा जी महाराज ने उसमें से यह मजमून निकालकर दिखाया:

राधा आदि सूरत का नाम । स्वामी आदि निज धाम ।।
सूरत शब्द और राधास्वामी । दोनों नाम एक कर जानी ।।

उन्होंने कहा कि सूरत-शब्द का यही मार्ग गुरु ग्रंथ साहिब का है और वही स्वामी जी महाराज कह रहे हैं। बस एक “राधा” का लफ्ज ज्यादा रख दिया है, “राधा” का अर्थ है रूह या आत्मा ओर “स्वामी” का अर्थ है मालिक अर्थत परमात्मा। यह सब सुन कर मेरी तसल्ली हो गई। ओर फिर जो दात बख्शनी थी बाबा जी महाराज ने बख्श दी। मैं दस दिन की छुट्टी लेकर उनके पास रहा। मेरे जो और भी संशय थे बाबा जी महाराज ने इस समय के दौरान सब दूर कर दिये। सो बिन गुरु के वाणी को समझ पाना मुश्किल है। वाणी को समझने के लिए गुरु का होना जरूरी है।

निष्कर्ष

साध संगत जी इस साखी में अपने पढ़ा कि कैसे गुरु महाराज अपने प्यारों की तलाश करते रहते हैं। और अपनी बक्षीश की मेहर उसके ऊपर बनाए रखते हैं। इस साखी में हमें बताया कि गुरु ही वह कड़ी है जो हमें परमात्मा के साथ जोड़ता है। बिना गुरु के हमारा परमात्मा से मिलाप हो पाना मुमकिन नहीं हैं। गुरु का प्रकाश हमें मार्ग दर्शन करवाते हैं ।

जो हमारी आँखों के आगे मोह माया के परदे पड़े हुए हैं, गुरु अपने ज्ञान से एक-एक करके बड़ी ही सहजता से उनको उठाते हैं और असल से हमारी पहचान करवाते हैं । हमें रूबरू करवाते हैं कि क्या हमारे लिए क्या सही है और क्या नहीं।

शिक्षा

तो साध संगत जी हमें भी चाहिए कि हम गुरु के हुक्म में रहें। गुरु के कहे अनुसार पर्याप्त समय भजन सिमरन को दें, नाम की कमाई करें। ताकि हमारा मनुष्य योनि मैं जन्म लेने का जो असल मकसद हैं, वो पूरा हो सके और साध संगत जी वो मकसद क्या है? बाबा जी हर सत्संग में फरमाते है। यह जिस्म जिसमें हम रह रहे हैं यह एक जेल खाना है चौरासी का। इससे हमे मुक्ति प्राप्त करनी हैं। ओर ये तभी संभव है जब हम नाम की कमाई करें और यही एक जरिया है इस चौरासी से बाहर निकलने का और कोई नहीं।

संगत के चरणों में इस दासी की प्यार भरी राधा स्वामी जी

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