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Sakhi Huzur aur do Musalmanon ki

हजूर बड़े महाराज जी पहलगांव से चलकर इचछाबल पहुंचे, वहां पहुँच कर हजूर ने लाजो बीबी जी से फ़रमाया, “काको, (लाजो बीबी को प्यार से काको बुलाते थे) लोग बाहर ठंडक ढूंढते है, अंदर की ठंडक नहीं देखते, जिससे शांति मिलनी है। बाहर की ठंडक तो आनी जानी है और अदंर की साथ निभाने वाली है, उसकी और तवज्जोह नही देते।,”

जहाँ सतगुरु को सत्संग करना था, उस बगीचे का लान हरी भरी घास वाला बड़ा ही खूबसूरत था।

लान मे दो पीपल के पेड़ थे, उनकेे नीचे बड़ा सा चौंतरा बना हुआ था। जिस पर दो मुसलमान बैठे हुए थे,

वो परमातमा का नाम लेने वाले फ़कीरो जैसे लगते थे। हजूर सब कुछ देखकर वहां मैदान मे आ गये। सारी संगत भी हजूर जी के आस—पास बैठ गई।

हजूर ने कहा, “भाई सबने खाना खाया हुआ है, सब आराम कर लो। सब लॉन मे लेट गये।

हजूर जी के लिए दरी, चदर, तकिया,दौ तौलिये सफर मे साथ ही रहते थे।

हजूर जी के लिये भाई शादी ने बिछा दिये,और हजूर को लेट जाने को कहा, हजूर ने कहा ठीक है और लेट गये।

हजूर लेटे हुए बहुत ही सुंदर लग रहे खे,उनकी सुंदरता पर सूरज की रौशनी भी शरमाती थी और दाढ़ी से नूर किरणें झड़ती थी। मैं ( लाजो बीबी ) दूर बैठी देख रही थी। दोनो मुसलमान हजूर को झुककर देख देख कह रहे थे, ” यह जो बुजुर्ग लेटा हुआ है, यह तो कोई कामिल फ़क़ीर नजर आता है,अहा कैसा खूबसूरत है! चेहरे पर खुदा का नूर टपकता है।,”

वह बीबी लाजो से पूछने लगे, ” बीबी यह बुज़ुर्ग जो लेटे हुए है, कौन है? हमे तो ख़ुदा का रूप नज़र आते है। चेहरे पर नूर ही नूर टपकता है।

मुझे, (लाजो) उनकी बातें बहुत पयारी लगी। मैंने कहा, ” वीर जी नूर का ही सवरूप है, कोई आँखो वाला ही पहचान सकता है। आपके धन भाग है, जो प्यार से दर्शन कर रहे हैं,”।

वो पूछने लगे, ” कुछ बात करें तो सुन लेंगे ? ” मैंने (लाजो) कहा, ” हाँ वीर जी, सबकी बात सुनते है, सबको एक नज़र से देखते है, हिंदु, मुसलिम, सिख,ईसाई कोई भी हो, सबको प्यार करते है।,”

इतनी देर में सच्चे पातशाह उठकर बैठ गये। उसी वक्त हजूर जी ने मुझे (लाजो) आवाज लगाई, ” काको, (लाजो बीबी) कोई शब्द पढ़ो।,” मैंने (लाजो) पूछा,
सतगुर जी कौंन सा शब्द, पढ़ू। दीनदयाल जी ने उत्तर दिया, ” दिल का हुजरा साफ़ कर जानां के आने के लिए,”

मैं (लाजो) बहुत हैरान हुई क्योंकि मेरे दिल में विचार था कि हजूर उठेंगे,तो उनसे कहुँगी कि हजूर आप यही शब्द पढ़े,?

मुसलमान प्रेमियों को देखकर हजूर ने स्वयं ही फऱमा दिया और उनके बैठते ही बोले, “कहो भाई मियां जी आप कहाँ से आये हैं? कोई सेवा फऱमाओ,”।

उन्होंने हाथ जोड़ कर सलाम किया और कहा “बस हजूर के दीदार की ख़्वाहिश है।,” हजूर ने उनसे फऱमाया, ” भाई कोई बात करनी है तो कर लो।, ” उन्होंने कहा, “आपके मुँह से कोई रब्बी बात सुनना चाहते हैं।,” हजूर ने शब्द पढ़वा कर बड़े प्रेम से सत्संग सुनाया। उनके दिल की इच्छा पूरी हुई

वह दोनो मुसलमान बहुत खुश हुए सतगुर ने फऱमाया,”काको (लाजो) इन्हीं के लिए हम यहाँ आए थे। अब यह दोनो नाम लेगें। नाम कोई छोटी दौलत नहीं बिना भाग्य के नहीं मिलता । नाम बहुत किस्मत वाले को मिलता है, जिनके भाग्य में हो।”

फिर हजूर संगत से कहने लगें” भाई शाम हो चली है, हमें, श्रीनगर पहुँचना है।,” संगत ने सत्य वचन कहा। हजूर अमृत वर्षा कर वहाँ से चले और डेरे पहुँचे ।

तीसरे दिन उन दोनो मुसलमानो ने भाव विभोर होकर हजूर जी से नाम लेने की विनती की हजूर दीनदयाल जी ने उन दोनो को दया कर नाम की दौलत बख़्शी उन दोनो को खुश किया और कहा ” भाई नाम शब्द की कमाई करना तब पता चलेगा मुसलमानी क्या है एेसे ही नाम लेकर रख नही छोड़ना खूब मेहनत करना।

उन्होनें कहा, ” बहुत अच्छा जनाब।,”दो तीन दिन सत्संग सुनकर वह दोनो जाने को तैयार हुए। हजूर ने बड़े प्यार से उन्हें विदा किया

बीबी लाजो जी की अपने सतगुर के प्यार में बहे आँसू और उनकी वेदना भरे स्वर थे – हे प्यारे सतगुर जी आप तो लाख़ों जीवो का उदार करके अपने निजधाम सिधार गये किन्तु मुझ दासी को बिरह की एेसी आग लगा गये कि जिसका अनुमान लगाना पत्येक जीव के लिए कठिन है।

मीरा ने सच ही कहा है. – घायल की गति घायल़़ जाने के जिन लागी होय

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